बालै जोबनि जे नर जती, काल दुकालां ते नर सती I
फ़ुरते भोजन अलप अहारी, नाथ कहै सो काया हमारी II
बाल्यावस्था और योवन में जो व्यक्ति संयम के द्वारा इन्द्रिय निग्रह करते है वे समय असमय में सर्वदा
अपने सत पर स्थिर रह सकते है I वे फुर्ती से भोजन करते हे, कम खाते है, नाथ कहते है कि वे हमारे
शरीर है I उनमे और मुझमे कुछ अंतर नहीं I
फ़ुरते भोजन अलप अहारी, नाथ कहै सो काया हमारी II
बाल्यावस्था और योवन में जो व्यक्ति संयम के द्वारा इन्द्रिय निग्रह करते है वे समय असमय में सर्वदा
अपने सत पर स्थिर रह सकते है I वे फुर्ती से भोजन करते हे, कम खाते है, नाथ कहते है कि वे हमारे
शरीर है I उनमे और मुझमे कुछ अंतर नहीं I

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