सबदहिं ताला सबदहिं कूंची, सबदहिं सबद जगाया I
सबदहिं सबद सूं परचा हुआ, सबद ही सबद समाया II
सबदहिं सबद सूं परचा हुआ, सबद ही सबद समाया II
शब्द ही ताला है, वही परमतत्व को बंद किये रहता है I शब्द की धारा ही शूक्ष्म परमतत्व पर स्थूल आवरणों को बाँधकर सृष्टि का निर्माण करती है I इसलिए मूल अधिष्ठान तक पहुँचने के लिए शब्द की धारा पकड़कर वापिस आना पड़ता है, इसीलिए वही कुंजी भी है, जिससे ताला खोला जाता है I गुरु के शब्द में भी परमतत्व रहता है जो उसी के मनन चिंतन से खुलता है I शब्द नाद का जागरण इसी गुरु उपदेश के कारण होता है I जब इस प्रकार स्थूल शब्द के द्वारा सूक्ष्म शब्द से परिचय हो जाता है तब स्थूल शब्द सूक्ष्म मूलशब्द में समा जाता है I
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