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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Tuesday, April 12, 2016

Gorakh - Baani (Shabdi - 33)

अवधू आहार तोड़ो निद्रा मोड़ो कबहुँ न होइगा रोगी I
छठे छ मासे काया पल्टिबा ज्यूँ को को बिरला बिजोगी II

हे अवधूत ! आहार तोड़ो, मिताहार करो, नींद को अपने पास न फटकने दो, छठे छ मासे कायाकल्प किया करो इससे तुम कभी रोगी नहीं होओगे कोई कोई विरले जोगी ऐसा कर सकते है I

Gorakh - Baani ( Shabdi - 32 )

थोड़ा बोलै थोड़ा शाई तिस घटी पवना रहे समाइ I
गगन मंडल में अनहद बाजै प्यंड पड़ै तो सतगुरु लाजै II 

जो थोड़ा बोलता और थोड़ा खाता है, उसके शरीर में पवन समाया रहता है, जिससे आकाश-मंडल ब्र्ह्मरन्ध्र में 
अनाहत नाद सुनाई देता है इसलिए अमरत्व प्राप्त करने का साधन हमारे ही पास होने पर भी यदि यह शरीर नाश हो जाये तो सद्गुरु के लिए लज्जा की बात है I

Gorakh - Baani (Shabdi - 31)

धाये न षाईबा भूषेन मरिबा अहनिसि लेबा ब्रह्म अगनि का भेवं I
हठ न करिबा पड्या न रहिबा यूँ बोल्या गोरष देवं II

भोजन पर टूट नहीं पड़ना चाहिए यानि अधिक नहीं खाना चाहिए I न भूखे ही रहना चाहिए I  रात दिन ब्र्ह्माग्नि को ग्रहण करना चाहिए I  शरीर के साथ हठ नहीं करना चाहिए और न पड़ा ही रहना चाहिए I

Gorakh- Baani (Shabdi - 30)

स्वामी बन षंण्डि जाऊं तो षुध्या व्यापै नगरी जाऊँ त माया 
भरी भरी शाऊ त बिंद बियापै क्यों सिझति जल ब्यंद की काया I

हे स्वामी, जो वनखण्ड जाता हूँ तो क्षुधा व्यापती है, भूख सताती है, नगर में जाता हूँ तो माया आकृष्ट करती है, 
और भर भर कर खाता हूँ तो शुक्र के बढ़ने से काम वासना सताती है  तब जल बून्द अर्थात शुक्र से निर्मित इस शरीर को किस प्रकार सिद्ध बनाए 

Monday, April 4, 2016

Gorakh-Baani (Shabdi-29)

नाथ कहै तुम सुनहु रे अवधू दिढ करि राषहु चीया 
काम क्रोध अहंकार निबारौ तौ सबै दिसंतर किया II

योगिो का कोई घर बार नहीं, सारी दुनिया उनका घर है इसलिए वे सर्वत्र घूमते रहते है I  यह उनकी विरक्ति का सूचक है किन्तु कुछ को देशाटन की ही चाट पड़ जाती है 
इसलिए गोरखनाथ का अवधूतों के लिए एक उपदेश है की देश-देशांतर में जाना स्वयं देशांतर के उद्देश्य से आवश्यक नहीं है यदि चित्त स्थिर है और काम क्रोध का निवारण हो गया है तो सब देशांतर हो गए क्योकि निवृति के ही हेतु देशांतर किया जाता है, जो चित्त की स्थिरता से निष्पन्न हो जाता है 

Gorakh-Baani(Shabdi-28)

भरया ते थीरं झलझलन्ति आधा I 
सिद्धें सिद्ध मिल्या रे अवधू बोल्या अरु लाधा II 

जो भरे है, ज्ञानपूर्ण है, वे स्थिर गम्भीर होते है, अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते नहीं फिरते I जो अधकचरे है वे छलछलाते रहते है, चंचलतावश जगह बे जगह ज्ञान छांटा करते है I (किन्तु उससे लाभ किसी का नहीं होता ) सिद्ध ऐसे लोगो से नहीं बोलते ! हे अवधूत ! जब सिद्ध सिद्ध मिलते है, तभी उनमे वार्तालाभ संभव है I  उससे उन्हें लाभ भी होता है I भरा पात्र नहीं छलकता आधा ही छलकता है I 

Wednesday, March 30, 2016

Gorakh-Baani(Sabdi-27)

हबकि न बोलिबा, ठबकि न चालिबा धीरै धारिबा पावं I 
गरब न करिबा सहजै रहिबा भणत गोरष रावं II 


सब व्यवहार 'युक्त' होने चाहिए, सोच समझ- कर करने चाहिए I  अचानक फट से बोल नहीं उठना चाहिए I जोर से पाँव पटकते हुए नहीं चलना चाहिए I धीरे धीरे पाँव रखना चाहिए I  गर्व नहीं करना चाहिए I सहज स्वाभाविक स्थिति में रहना चाहिए, यह गोरखनाथ का उपदेश(कथन) है II