Featured Post

Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Friday, August 23, 2013

Gorakh-Baani (Sabdi-9)

महंमद महंमद न करि काजी महंमद का विष बिचारं I
महंमद हाथि करद जे होती लोहै घड़ी न सारं II

हे काजी ' मुहम्मद  मुहम्मद ' न करो I क्योकि तुम मुहम्मद को जानते नहीं हो I तुम समझते हो की जीव हत्या करते हुए हम  मुहम्मद के मार्ग का अनुसरण करते है परन्तु मुहम्मद का विचार बहुत गंभीर और कठिन है I मुहम्मद के हाथ में जो छुरी थी वह न लोहे की गढ़ी हुई थी, न इस्पात की, जिससे जीवहत्या होती है I 

Saturday, June 22, 2013

Gorakh-Baani(Sabdi-8)

हसिबा षेलिबा धरिबा ध्यान I अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियान I 
हँसे षेले न करे मन भंग I ते निहचल सदा नाथ के संग II ८ II 

हँसना, खेलना और ध्यान धरना चाहिए I रात दिन ब्रह्म ज्ञान का कथन करना चाहिए I 
इस प्रकार (संयमपूर्वक ) हँसते - खेलते हुए जो अपने मन को भंग नहीं करते वे निश्चल होकर ब्रह्म के साथ रमण करते है I 

Saturday, June 15, 2013

Gorakh-Baani(Sabdi-7)

हसिबा षेलिबा रहीबा रंग, काम क्रोध न करीबा संग I 
हसिबा षेलिबा गाइबा गीत, दिढ़ करि राशि आपना चीत I 


हँसना चाहिए, खेलना चाहिए, मस्त रहना चाहिए किन्तु कभी काम क्रोध का साथ न करना चाहिए I हँसना, खेलना और गीत  गाना चाहिए I किन्तु अपने चित्त को दृढ़ करके रखना चाहिए II 7 II 

Friday, June 14, 2013

Gorakh-Baani(Sabdi-6)

वेदे न सास्त्रे कतेबे न कुराणे पुस्तके न बंच्या जाई I 
ते पद जाना बिरला जोगी और दुनी सब धंधे लाई II ६II 


वेदों, शास्त्रों -किताबी धर्म की किताबों , कुरान आदि ग्रंथो में जिस पर-ब्रह्मपद का वर्णन नहीं पढ़ा जा सकता, 
उस पद को बिरले योगी जानते है I बाकी दुनिया तो माया में लिप्त होकर धंधो ही में लगी रहती है I 

Thursday, June 13, 2013

Gorakh-Baani (Sabdi-5)

अलष बिनाणी दोई दीपक रचिले तीन भवन इक जोती I 
तास बिचारत त्रिभुवन सूझै चुणील्यों माणिक मोती I 

 विज्ञानं स्वरुप अलक्ष्य परब्रह्म ने दो दीपकों (व्यक्त और अव्यक्त स्वरुप संविकल्प और निर्विकल्प समाधी) की रचना की I उन दोनों दीपकों में अलक्ष का ही प्रकाश है I उसी एक ज्योति से तीनो लोक व्याप्त है I  उस ज्योति पर विचार करने से तीनो लोक सूझने लगते है, त्रिलोक दर्शिता आती है और हंस -स्वरुप आत्मा ज्ञान- रूप मोतियों को चुगने लगता है तथा उसे माणिक्य रूप केवाल्यानुभुती हो जाती है I 

Tuesday, June 11, 2013

Gorakh-Baani (sabdi 4)

वेद कतेब न षाणी बाणी I सब ढंकी तलि आंणी I 
गगनि सिषर महि सबद प्रकास्या I तहं बूझे अलष बिनांणी I 

परब्रह्म का ठीक ठीक निर्वाचन न वेद कर पाये है, न किताबी धर्मो की पुस्तके और न चार खानि की वाणी I ये सब तो उसे आच्छादन के नीचे ले आये है I उन्होंने तो सत्य को प्रकट करने के बदले उसके ऊपर आवरण डाल दिया I यदि ब्रह्म स्वरुप का यथार्थ ज्ञान तुम्हे अभीष्ट है तो ब्रह्मरंध्र यानी गगन शिखर में समाधी द्वारा जो शब्द प्रकाश में आता है, उसमे विज्ञानं रूप अलक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करो I 

Monday, June 10, 2013

Gorakh Baani (Sabdi-3)

इहाँ ही आछे इहाँ ही अलोप I इहाँ ही रचिले तीनी त्रिलोक I 
आछे संगे रहे जू वा I ता कारणी अनन्त सिधा जोगेस्वर हूवा I

अक्षय (आछे ) परब्रह्म यहाँ अर्थात सहस्रार या ब्रह्मरंध्र (शून्य ) में ही है I यहीं वह गुप्त (अलोप) है I तीनो लोक की रचना यही से हुई है I (ब्रह्म का ही व्यक्त स्वरुप यह ब्रह्माण्ड है I ब्रह्मरंध्र रूप केंद्र ही से उसने अपना सर्वदिक प्रसार किया है I ) ऐसा जो अक्षय परब्रह्म सर्वदा हमारे साथ रहता है, उसी के कारण (उसी को प्राप्त करने के लिए )अनंत सिद्ध योग मार्ग में प्रवेश कर योगेश्वर हो जाते है I 

Friday, June 7, 2013

Gorakh- Baani (sabdi 2)

अदेषी देषिबा देषि बिचारिबा अदिसिटि राषिबा चीया I 
पाताल की गंगा ब्रह्मण्ड चढाईबा, तहाँ बिमल बिमल जल पीया II २ II 

न देखे हुए (परब्रह्म ) को देखना चाहिए I देखकर उस पर विचार करना चाहिए I जो आँखों से देखा नहीं जा सकता उसे चित्त में रखना चाहिए I पाताल (मणिपुर चक्र ) की गंगा (योगिनी शक्ति , कुण्डलिनी ) को ब्रह्माण्ड (ब्रह्मरंध्र, सहस्रार या सहस्रदल कमल ) में प्रेरित करना चाहिए I वही पहुँच कर (योगी साक्षात्कार रूप) निर्मल रस पीता है I 

Thursday, June 6, 2013

Gorakh-Baani (Sabdi -1 )

बसती न सुन्यम, सुन्यम न बसती अगम अगोचर ऐसा I 
गगन सिषर महि बालक बोलै ताका नौव धरहुगे कैसा II १ II 

परम तत्त्व तक किसी की पहुच नहीं है I (अगम) I व इन्द्रियों का विषय नहीं है (अगोचर) I
वह  ऐसा है की न हम उसे बस्ती कह सकते है, और न शून्य I न यह कह सकते है की वह कुछ है (बस्ती) और न यह की वह कुछ नहीं है (शून्य) I वह भाव (बस्ती) और अभाव (शून्य), सत और असत दोनों से परे है I वह आकाश मंडल में बोलने वाला बालक है I ( आकाश मंडल में बोलने वाला इसलिए कहा की शून्य अथवा आकाश या  ब्रह्मरंध्र में ही ब्रह्म का निवास माना जाता है, वही पहुचने पर ब्रह्म साक्षात्कार हो सकता है I वही आत्मा को ढूंढना चाहिए I बालक इसलिए की जिस प्रकार बालक पाप पुण्य से अछुता है, उसी प्रकार परमात्मा भी I जरा मरण से दूर, काल से अस्पृष्ट सतत बाल स्वरुप ही योगियों का साध्य आदर्श है I इसीलिए " गोरख गोपालं " "बूढा बालं " कहे जाते है I उनका नाम कैसे रख सकते है ? क्योकि वह तो नाम और रूप दोनों ही उपाधियो से परे है I