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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Monday, February 29, 2016

Gorakh- Baani (Sabdi-20)

बालै जोबनि जे नर जती, काल दुकालां ते नर सती 
फ़ुरते भोजन अलप अहारी, नाथ कहै सो काया हमारी I

बाल्यावस्था और योवन में जो व्यक्ति संयम के द्वारा इन्द्रिय निग्रह करते है वे समय असमय में सर्वदा 
अपने सत पर स्थिर रह सकते है  वे फुर्ती से भोजन करते हे, कम खाते है, नाथ कहते है कि वे हमारे 
शरीर है  उनमे और मुझमे कुछ अंतर नहीं 

Gorakh-Baani (Sabdi-19)

धन जोवन की करै न आस, चित्त न राशै कामनि पास 
नाद बिन्द जाकै घटि जरै, ताकि सेवा पारबती करै I

जो धन यौवन की आशा नहीं करता, स्त्री में मन नहीं लगाता, जिसके शरीर में 

नाद और बिन्द जीर्ण होते रहते है, पारवती भी उसकी सेवा करती है 

Friday, February 26, 2016

Gorakh-Baani ( Sabdi-18)

अजपा जपै सुनि मन धरै, पांचों इंद्री निग्रह करै 
ब्रह्म अग्नि में होमै काया, तास महादेव बन्दे पाया I


जो अजपा का जाप करता है, ब्रह्मरंध्र (शून्य) में मन को लीन किये रहता है, पांचों इन्द्रियों को अपने वश में रखता है, ब्रह्मानुभूति रूप अग्नि में अपने भौतिक अस्तित्व यानी काया की आहुति कर डालता है, योगीश्वर महादेव भी उसके चरणो की वंदना करता है 


Gorakh-Baani (Sabdi-17)

अरधै जाता उरधै धरै, कांम दगध जे जोगी करे 
तजै अल्यंगन काटै माया, ताका बिसनु पशालै पाया I


नीचे की गति वाले रेतस (शुक्र) को ऊपर की और प्रेरित करे, ऐसा उर्ध्वरेता होकर जो काम को भस्म कर देता हे, कामिनी का आलिंगन छोड़ देता हे और माया को काट डालता है  जिसके चरण पखारने से गंगा निकलती हे, वह विष्णु भी उस जोगी के चरण धोता है 

Gorakh-Baani (Sabdi-16)

अह निसि मन लै उनमन रहै, गम की छाण्डि अगम की कहै 
छाड़े आसा रहै निरास , कहे ब्रह्म्मा हूँ ताको दास I


जो रात दिन बहिर्मुखी मन को उन्मानावस्था में लीं किये रहता है , गम्य जगत की बाते छोड़ कर अगम्य आध्यात्मिक  क्षेत्र की बाते करता है, सब आशाओ को छोड़ देता हे, कोई आशा नहीं रखता वह ब्रह्म्मा से भी बढ़कर है, ब्रह्म्मा उसका दासत्व स्वीकार करता है 

Gorakh- Baani (Sabdi - 15)

मान्या सबद चुकाया दंद I निहचै राजा भरथरी परचै गोपीचंद I 
निहचै नरवै भए निर्दंद I परचै जोगी परमानन्द II 


जिसने गुरु वचनो को माना उसकी दुविधा नष्ट हो गयी I इसी निश्चय ने राजा भर्तहरी को बनाया, उन्हें सिद्धि दी और राजा गोपीचंद को ब्रह्म परिचय यानी आत्म साक्षात्कार कराया I इसी निश्चय ने नरपतियों को निर्द्वंद बना दिया जिससे आत्म साक्षात्कार के द्वारा वे पूर्ण परमानन्द प्राप्त करने वाले योगी हो गए I

Thursday, February 25, 2016

Gorakh Baani ( Sabdi - 14)

उत्पति हिन्दू जरणा जोगी अकली परि पीर मुसलमानी I
ते राह चिन्हों को काजी मुलां ब्रह्मा बिस्नु महादेव मांनी II

उतपति से हम हिन्दू है, जरणा के कारण जोगी है और अक्ल से मुसलमानी पीर I जोगी हिन्दू समुदाय से ही चेला मुंडाया करते है I योग सिद्धि के लिए ये आवश्यक है की गुरुमुख से पाये हुए ज्ञान को मनन , चिंतन और साधना के द्वारा स्वानुभव में ला सके I मुसलमानो में जिस प्रकार पीरो का मान है, उसी प्रकार योग मार्ग में गुरुओ का I नाथी ने तो पीर शब्द को ही स्वीकार कर लिया है I उनके महंत महंत नहीं पीर कहलाते है I किन्तु इसका अभिप्राय नहीं कि वस्तुतः कोई तात्विक मुसलमानी प्रभाव उन पर पड़ा हो I है मुल्लाओ और काजियों ! उस मार्ग को पहिचानो जिसे ब्रह्मा, विष्णु और महादेव तक ने माना है I

Gorakh-Baani(sabdi-13)

कोई बादी कोई बिबादी जोगी कौं बाद न करना I
अठसठि तीरथ समंदि समावै यूं जोगी कौं गुरुमुषि जरनां II

विभिन्न मत वाले पंडित अपने मत का मंडन और दुसरो के मत का खंडन करने में लगे रहते हे I किन्तु योगी को इस प्रकार के शास्त्रार्थ में नहीं पड़ना चाहिए I  जैसे सभी नदियों का (नदियों की संख्या अड़सठ मानी गयी हे ) जल समुन्द्र ही में समाता हे, उसी प्रकार शिष्य का विष्वास गुरुमुख वचनो में होना चाहिए I उन्ही वचनो का मनन-चिंतन द्वारा पाचन करके आत्मीकरण करने में उन्हें दत्तचित्त रहना चाहिए I

Gorakh Baani ( Sabdi-12)

सारमसारं गहर गम्भीरं गगन उछलिया नादं I
माणिक पाया फेरी लुंकाया झूठा बाद-बिबादम II


साधना के द्वारा ब्रह्मरंध्र तक पहुँचने पर अनाहत नाद सुनाई दिया , जो सार का भी सार और गंभीर से गंभीर हे इससे ब्रह्ममानुभूति रूप माणिक्य हाथ लगा परन्तु वह माणिक्य व्यक्तिगत साधना से प्राप्त होने पर भी दुनिया के लिए छिपा ही रहा वह स्वयंवेद्य हे, वाणी से किसी को बताया नहीं जा सकता इस अनुभूति के मिल जाने पर ज्ञात हुआ की सारा वाद विवाद झूठ हे सच्ची तो केवल अनुभूति हे I

Gorakh-Baani (Sabdi -11)

नाथ कहंता सब जग नाथ्या गोरष कहता गोई I
कलमा का गर मुहमद होता पहलै मुआ सोई II

शब्दों के बाह्यार्थ पर नहीं जाना चाहिए, उनका तत्वार्थ ग्रहण करना चाहिए इसी तत्वार्थ दृष्टि के अभाव में माया को अपने वश में रखने वाले 'नाथ' का नाम लेते हुए भी सारा संसार माया के द्वारा नाथ डाला गया I गोरख का नाम लेते हुए भी आध्यात्मिक जीवन गुप्त ही रह गया I इसी प्रकार खाली कलमा के शब्द भी किसी का उद्धार नहीं कर सकते I कलमा को चलाने वाले मुहम्मद भी बचे न रह सके I

gorakh-baani (Sabdi- 10)

सबदै मारी सबदै जिलाई ऐसे महंमद पीरं I
ताकै भरमि न भूलौ काजी सो बल नहीं सरीरं II

वह शिष्यों की भौतिकता को इसी शब्द की छुरी से मारते थे जिससे वे संसार की विषय- वासनाओ के लिए मर जाते थे I परन्तु यह शब्द की छुरी वस्तुतः जीवन प्रदायिनी थी क्योकि उनकी बहिर्मुखता के नष्ट हो जाने पर ही उनका वास्तविक आभ्यन्तर आध्यात्मिक जीवन आरम्भ होता था I महंमद ऐसे पीर थे हे काजिओ, उनके भ्रम में न भूलो, तुम उनकी नक़ल नहीं कर सकते I तुम्हारे शरीर में वह आत्मिक बल ही नहीं हे जो मुहम्मद में था ( क्योकि गोरक्षनाथ जी के अनुसार  मुहम्मद जिन बातो को आध्यात्मिक दृष्टि से कहते थे उनको उनके अनुयायियों ने भौतिक अर्थ में समझा ) II