अह निसि मन लै उनमन रहै, गम की छाण्डि अगम की कहै I
छाड़े आसा रहै निरास , कहे ब्रह्म्मा हूँ ताको दास II
जो रात दिन बहिर्मुखी मन को उन्मानावस्था में लींन किये रहता है , गम्य जगत की बाते छोड़ कर अगम्य आध्यात्मिक क्षेत्र की बाते करता है, सब आशाओ को छोड़ देता हे, कोई आशा नहीं रखता वह ब्रह्म्मा से भी बढ़कर है, ब्रह्म्मा उसका दासत्व स्वीकार करता है I
छाड़े आसा रहै निरास , कहे ब्रह्म्मा हूँ ताको दास II
जो रात दिन बहिर्मुखी मन को उन्मानावस्था में लींन किये रहता है , गम्य जगत की बाते छोड़ कर अगम्य आध्यात्मिक क्षेत्र की बाते करता है, सब आशाओ को छोड़ देता हे, कोई आशा नहीं रखता वह ब्रह्म्मा से भी बढ़कर है, ब्रह्म्मा उसका दासत्व स्वीकार करता है I
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