सबदै मारी सबदै जिलाई ऐसे महंमद पीरं I
ताकै भरमि न भूलौ काजी सो बल नहीं सरीरं II
ताकै भरमि न भूलौ काजी सो बल नहीं सरीरं II
वह शिष्यों की भौतिकता को इसी शब्द की छुरी से मारते थे जिससे वे संसार की विषय- वासनाओ के लिए मर जाते थे I परन्तु यह शब्द की छुरी वस्तुतः जीवन प्रदायिनी थी क्योकि उनकी बहिर्मुखता के नष्ट हो जाने पर ही उनका वास्तविक आभ्यन्तर आध्यात्मिक जीवन आरम्भ होता था I महंमद ऐसे पीर थे हे काजिओ, उनके भ्रम में न भूलो, तुम उनकी नक़ल नहीं कर सकते I तुम्हारे शरीर में वह आत्मिक बल ही नहीं हे जो मुहम्मद में था I ( क्योकि गोरक्षनाथ जी के अनुसार मुहम्मद जिन बातो को आध्यात्मिक दृष्टि से कहते थे उनको उनके अनुयायियों ने भौतिक अर्थ में समझा ) II
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