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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Thursday, February 25, 2016

gorakh-baani (Sabdi- 10)

सबदै मारी सबदै जिलाई ऐसे महंमद पीरं I
ताकै भरमि न भूलौ काजी सो बल नहीं सरीरं II

वह शिष्यों की भौतिकता को इसी शब्द की छुरी से मारते थे जिससे वे संसार की विषय- वासनाओ के लिए मर जाते थे I परन्तु यह शब्द की छुरी वस्तुतः जीवन प्रदायिनी थी क्योकि उनकी बहिर्मुखता के नष्ट हो जाने पर ही उनका वास्तविक आभ्यन्तर आध्यात्मिक जीवन आरम्भ होता था I महंमद ऐसे पीर थे हे काजिओ, उनके भ्रम में न भूलो, तुम उनकी नक़ल नहीं कर सकते I तुम्हारे शरीर में वह आत्मिक बल ही नहीं हे जो मुहम्मद में था ( क्योकि गोरक्षनाथ जी के अनुसार  मुहम्मद जिन बातो को आध्यात्मिक दृष्टि से कहते थे उनको उनके अनुयायियों ने भौतिक अर्थ में समझा ) II 

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