कोई बादी कोई बिबादी जोगी कौं बाद न करना I
अठसठि तीरथ समंदि समावै यूं जोगी कौं गुरुमुषि जरनां II
विभिन्न मत वाले पंडित अपने मत का मंडन और दुसरो के मत का खंडन करने में लगे रहते हे I किन्तु योगी को इस प्रकार के शास्त्रार्थ में नहीं पड़ना चाहिए I जैसे सभी नदियों का (नदियों की संख्या अड़सठ मानी गयी हे ) जल समुन्द्र ही में समाता हे, उसी प्रकार शिष्य का विष्वास गुरुमुख वचनो में होना चाहिए I उन्ही वचनो का मनन-चिंतन द्वारा पाचन करके आत्मीकरण करने में उन्हें दत्तचित्त रहना चाहिए I
अठसठि तीरथ समंदि समावै यूं जोगी कौं गुरुमुषि जरनां II
विभिन्न मत वाले पंडित अपने मत का मंडन और दुसरो के मत का खंडन करने में लगे रहते हे I किन्तु योगी को इस प्रकार के शास्त्रार्थ में नहीं पड़ना चाहिए I जैसे सभी नदियों का (नदियों की संख्या अड़सठ मानी गयी हे ) जल समुन्द्र ही में समाता हे, उसी प्रकार शिष्य का विष्वास गुरुमुख वचनो में होना चाहिए I उन्ही वचनो का मनन-चिंतन द्वारा पाचन करके आत्मीकरण करने में उन्हें दत्तचित्त रहना चाहिए I
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