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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Thursday, February 25, 2016

Gorakh-Baani(sabdi-13)

कोई बादी कोई बिबादी जोगी कौं बाद न करना I
अठसठि तीरथ समंदि समावै यूं जोगी कौं गुरुमुषि जरनां II

विभिन्न मत वाले पंडित अपने मत का मंडन और दुसरो के मत का खंडन करने में लगे रहते हे I किन्तु योगी को इस प्रकार के शास्त्रार्थ में नहीं पड़ना चाहिए I  जैसे सभी नदियों का (नदियों की संख्या अड़सठ मानी गयी हे ) जल समुन्द्र ही में समाता हे, उसी प्रकार शिष्य का विष्वास गुरुमुख वचनो में होना चाहिए I उन्ही वचनो का मनन-चिंतन द्वारा पाचन करके आत्मीकरण करने में उन्हें दत्तचित्त रहना चाहिए I

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