मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I
तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II
तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II
है जोगी ! मरो, मरण मीठा होता है I किन्तु वह मौत मरो जिस मौत से मरकर गोरखनाथ ने परमतत्व के दर्शन किये I (यह मरना सामान्य मृत्यु नहीं है, उससे भौतिक अस्तित्व का अंत नहीं समझना चाहिए I योगमार्ग में तो विश्वास यह चला आता है कि योगी कभी मरता नहीं I इसलिए यह मरना जीवन्मृत्यु है I इसी का दूसरा नाम जीवनमुक्ति है I
इसमें स्वार्थी अर्थ में मृत्यु समझना चाहिए I भौतिक अर्थ में तो व्यक्ति के जीवन का अंत ही-सा हो जाता है, अब वह आध्यात्मिक जीवन में परमार्थ के लिए जीता है I परमार्थ और परोपकार एक ही चीज नहीं I परन्तु परमार्थी जीवन परोपकार में भी अभिव्यक्त होता है I
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