हबकि न बोलिबा, ठबकि न चालिबा धीरै धारिबा पावं I
गरब न करिबा सहजै रहिबा भणत गोरष रावं II
गरब न करिबा सहजै रहिबा भणत गोरष रावं II
सब व्यवहार 'युक्त' होने चाहिए, सोच समझ- कर करने चाहिए I अचानक फट से बोल नहीं उठना चाहिए I जोर से पाँव पटकते हुए नहीं चलना चाहिए I धीरे धीरे पाँव रखना चाहिए I गर्व नहीं करना चाहिए I सहज स्वाभाविक स्थिति में रहना चाहिए, यह गोरखनाथ का उपदेश(कथन) है II