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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Wednesday, March 30, 2016

Gorakh-Baani(Sabdi-27)

हबकि न बोलिबा, ठबकि न चालिबा धीरै धारिबा पावं I 
गरब न करिबा सहजै रहिबा भणत गोरष रावं II 


सब व्यवहार 'युक्त' होने चाहिए, सोच समझ- कर करने चाहिए I  अचानक फट से बोल नहीं उठना चाहिए I जोर से पाँव पटकते हुए नहीं चलना चाहिए I धीरे धीरे पाँव रखना चाहिए I  गर्व नहीं करना चाहिए I सहज स्वाभाविक स्थिति में रहना चाहिए, यह गोरखनाथ का उपदेश(कथन) है II 

Thursday, March 24, 2016

Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I 
तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II 

है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत से मरकर गोरखनाथ ने परमतत्व के दर्शन किये I (यह मरना सामान्य मृत्यु नहीं है, उससे भौतिक अस्तित्व का अंत नहीं समझना चाहिए I योगमार्ग में तो विश्वास यह चला आता है कि योगी कभी मरता नहीं I  इसलिए यह मरना जीवन्मृत्यु है I इसी का दूसरा नाम जीवनमुक्ति है  I 

इसमें स्वार्थी अर्थ में मृत्यु समझना चाहिए I  भौतिक अर्थ में तो व्यक्ति के जीवन का अंत ही-सा हो जाता है, अब वह आध्यात्मिक जीवन में परमार्थ के लिए जीता है I परमार्थ और परोपकार एक ही चीज नहीं I  परन्तु परमार्थी जीवन परोपकार में भी अभिव्यक्त होता है I 

Gorakh-Baani(Sabdi-25)

बात सहेती सब जग बास्या, स्वाद सहेता मीठा I 
साच कहूं तौ सतगुरु मानै रूप सहेता दीठा II 

ब्रह्म की सुगन्धि से सार जगत सुगन्धित है I वह जगत में सुगन्धि के समान व्याप्त है I  उसके स्वाद से सारा जगत मीठा है I जिसको ब्रह्मानंद का आस्वाद मिल जाता है उसके लिए संसार के आत्यन्तिक दुःख की कटुता मिट जाती है, और जगत आनंदमय (मीठा ) हो जाता है I (क्योकि समस्त जगत में उसे) उसी का रूप दिखाई देता है I ( उसके रूप से जगत सुन्दर है ) I  इस सत्य का विश्वास केवल सद्गुरु को हो सकता है I   

Monday, March 14, 2016

Gorakh-Baani( Sabdi - 24)

गगने न गोपंत तेजे न सोषन्त पवने न पेलंत बाई I 
यही भारे न भाजंत उदके न डूबंत कहौ तौ को पतियाई II 

आत्मतत्त्व का अनुभव कर लेने पर जान पड़ता है की उसे न तो आकाश(पंचभूतों में से एक ) गुप्त कर सकता है, न अग्नि सुख सकती है, न हवा इधर-उधर झोंके से उड़ा(प्रेरित कर)  सकती है, न पृथ्वी का भार तोड़ (विभक्त कर) सकता  है, न पानी डूबा सकता है, परन्तु यदि यह बात मै किसी से कहुँ तो कौन मेरा विश्वास कर सकता है  I क्योकि इस तत्वों के साथ जिन गुणों और क्रियाओ का सम्बन्ध जान साधारण सामान्यतया देखा करते है, उसको मेरे कथन में विरोध दिख पड़ेगा II 

Gorakh-Baani(Sabdi-23)

गगन मंडल मै ऊंधा कूबा तहाँ अंम्रत का बासा I 
सगुरा होइ सु भरि भरि पीवै निगुरा जाइ प्यासा II 

आकाश मंडल यानी शून्य अथवा ब्रह्म्मरन्ध्र में एक औन्धे मुँह का कुआँ है, जिसमे अमृत का वास है I जिसने अच्छे गुरु की शरण ली है वही उसमे से भर-भरकर अमृत पी सकता है क्योकि उसे पीने का उपाय गुरु ही बता सकता है I जिसने किसी अच्छे गुरु को धारण नहीं किया वह इस अमृत का पान नहीं कर सकता, प्यासा ही रह जाता है I 

Gorakh-Baani (Sabdi -22)

पंथबिन चलिबा अगनि बिन जलिबा, अनिल तृषा जहटिया 
ससंबेद श्री गुरु गोरष नाथ कहिया बूझिल्यौ पंडित पढिया I


मार्ग के बिना चलना, अग्नि के बिना जलना, वायु से प्यास का बुझना ( ठगा जाना ) - यह केवल अनुभव से जानने के योग्य है I  यह अपना अनुभव ज्ञान गुरु गोरखनाथ ने कहा है, हे पंडितो इसको समझो I



Gorakh_Baani(Sabdi-21)

सबदहिं ताला सबदहिं कूंची, सबदहिं सबद जगाया 
सबदहिं सबद सूं परचा हुआ, सबद ही सबद समाया I

शब्द ही ताला है, वही परमतत्व को बंद किये रहता है I शब्द की धारा ही शूक्ष्म परमतत्व पर स्थूल आवरणों को बाँधकर सृष्टि का निर्माण करती है I इसलिए मूल अधिष्ठान तक पहुँचने के लिए शब्द की धारा पकड़कर वापिस आना पड़ता है, इसीलिए वही कुंजी भी है, जिससे ताला खोला जाता है I गुरु के शब्द में भी परमतत्व रहता है जो उसी के मनन चिंतन से खुलता है I शब्द नाद का जागरण इसी गुरु उपदेश के कारण होता है जब इस प्रकार स्थूल शब्द के द्वारा सूक्ष्म शब्द से परिचय हो जाता है तब स्थूल शब्द सूक्ष्म मूलशब्द में समा जाता है