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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Thursday, June 13, 2013

Gorakh-Baani (Sabdi-5)

अलष बिनाणी दोई दीपक रचिले तीन भवन इक जोती I 
तास बिचारत त्रिभुवन सूझै चुणील्यों माणिक मोती I 

 विज्ञानं स्वरुप अलक्ष्य परब्रह्म ने दो दीपकों (व्यक्त और अव्यक्त स्वरुप संविकल्प और निर्विकल्प समाधी) की रचना की I उन दोनों दीपकों में अलक्ष का ही प्रकाश है I उसी एक ज्योति से तीनो लोक व्याप्त है I  उस ज्योति पर विचार करने से तीनो लोक सूझने लगते है, त्रिलोक दर्शिता आती है और हंस -स्वरुप आत्मा ज्ञान- रूप मोतियों को चुगने लगता है तथा उसे माणिक्य रूप केवाल्यानुभुती हो जाती है I 

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