अलष बिनाणी दोई दीपक रचिले तीन भवन इक जोती I
तास बिचारत त्रिभुवन सूझै चुणील्यों माणिक मोती I
विज्ञानं स्वरुप अलक्ष्य परब्रह्म ने दो दीपकों (व्यक्त और अव्यक्त स्वरुप संविकल्प और निर्विकल्प समाधी) की रचना की I उन दोनों दीपकों में अलक्ष का ही प्रकाश है I उसी एक ज्योति से तीनो लोक व्याप्त है I उस ज्योति पर विचार करने से तीनो लोक सूझने लगते है, त्रिलोक दर्शिता आती है और हंस -स्वरुप आत्मा ज्ञान- रूप मोतियों को चुगने लगता है तथा उसे माणिक्य रूप केवाल्यानुभुती हो जाती है I
No comments:
Post a Comment