इहाँ ही आछे इहाँ ही अलोप I इहाँ ही रचिले तीनी त्रिलोक I
आछे संगे रहे जू वा I ता कारणी अनन्त सिधा जोगेस्वर हूवा I
अक्षय (आछे ) परब्रह्म यहाँ अर्थात सहस्रार या ब्रह्मरंध्र (शून्य ) में ही है I यहीं वह गुप्त (अलोप) है I तीनो लोक की रचना यही से हुई है I (ब्रह्म का ही व्यक्त स्वरुप यह ब्रह्माण्ड है I ब्रह्मरंध्र रूप केंद्र ही से उसने अपना सर्वदिक प्रसार किया है I ) ऐसा जो अक्षय परब्रह्म सर्वदा हमारे साथ रहता है, उसी के कारण (उसी को प्राप्त करने के लिए )अनंत सिद्ध योग मार्ग में प्रवेश कर योगेश्वर हो जाते है I
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