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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Friday, June 7, 2013

Gorakh- Baani (sabdi 2)

अदेषी देषिबा देषि बिचारिबा अदिसिटि राषिबा चीया I 
पाताल की गंगा ब्रह्मण्ड चढाईबा, तहाँ बिमल बिमल जल पीया II २ II 

न देखे हुए (परब्रह्म ) को देखना चाहिए I देखकर उस पर विचार करना चाहिए I जो आँखों से देखा नहीं जा सकता उसे चित्त में रखना चाहिए I पाताल (मणिपुर चक्र ) की गंगा (योगिनी शक्ति , कुण्डलिनी ) को ब्रह्माण्ड (ब्रह्मरंध्र, सहस्रार या सहस्रदल कमल ) में प्रेरित करना चाहिए I वही पहुँच कर (योगी साक्षात्कार रूप) निर्मल रस पीता है I 

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