अदेषी देषिबा देषि बिचारिबा अदिसिटि राषिबा चीया I
पाताल की गंगा ब्रह्मण्ड चढाईबा, तहाँ बिमल बिमल जल पीया II २ II
न देखे हुए (परब्रह्म ) को देखना चाहिए I देखकर उस पर विचार करना चाहिए I जो आँखों से देखा नहीं जा सकता उसे चित्त में रखना चाहिए I पाताल (मणिपुर चक्र ) की गंगा (योगिनी शक्ति , कुण्डलिनी ) को ब्रह्माण्ड (ब्रह्मरंध्र, सहस्रार या सहस्रदल कमल ) में प्रेरित करना चाहिए I वही पहुँच कर (योगी साक्षात्कार रूप) निर्मल रस पीता है I
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