बसती न सुन्यम, सुन्यम न बसती अगम अगोचर ऐसा I
गगन सिषर महि बालक बोलै ताका नौव धरहुगे कैसा II १ II
परम तत्त्व तक किसी की पहुच नहीं है I (अगम) I व इन्द्रियों का विषय नहीं है (अगोचर) I
वह ऐसा है की न हम उसे बस्ती कह सकते है, और न शून्य I न यह कह सकते है की वह कुछ है (बस्ती) और न यह की वह कुछ नहीं है (शून्य) I वह भाव (बस्ती) और अभाव (शून्य), सत और असत दोनों से परे है I वह आकाश मंडल में बोलने वाला बालक है I ( आकाश मंडल में बोलने वाला इसलिए कहा की शून्य अथवा आकाश या ब्रह्मरंध्र में ही ब्रह्म का निवास माना जाता है, वही पहुचने पर ब्रह्म साक्षात्कार हो सकता है I वही आत्मा को ढूंढना चाहिए I बालक इसलिए की जिस प्रकार बालक पाप पुण्य से अछुता है, उसी प्रकार परमात्मा भी I जरा मरण से दूर, काल से अस्पृष्ट सतत बाल स्वरुप ही योगियों का साध्य आदर्श है I इसीलिए " गोरख गोपालं " "बूढा बालं " कहे जाते है I उनका नाम कैसे रख सकते है ? क्योकि वह तो नाम और रूप दोनों ही उपाधियो से परे है I
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