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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Monday, April 4, 2016

Gorakh-Baani(Shabdi-28)

भरया ते थीरं झलझलन्ति आधा I 
सिद्धें सिद्ध मिल्या रे अवधू बोल्या अरु लाधा II 

जो भरे है, ज्ञानपूर्ण है, वे स्थिर गम्भीर होते है, अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते नहीं फिरते I जो अधकचरे है वे छलछलाते रहते है, चंचलतावश जगह बे जगह ज्ञान छांटा करते है I (किन्तु उससे लाभ किसी का नहीं होता ) सिद्ध ऐसे लोगो से नहीं बोलते ! हे अवधूत ! जब सिद्ध सिद्ध मिलते है, तभी उनमे वार्तालाभ संभव है I  उससे उन्हें लाभ भी होता है I भरा पात्र नहीं छलकता आधा ही छलकता है I 

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