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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Monday, April 4, 2016

Gorakh-Baani (Shabdi-29)

नाथ कहै तुम सुनहु रे अवधू दिढ करि राषहु चीया 
काम क्रोध अहंकार निबारौ तौ सबै दिसंतर किया II

योगिो का कोई घर बार नहीं, सारी दुनिया उनका घर है इसलिए वे सर्वत्र घूमते रहते है I  यह उनकी विरक्ति का सूचक है किन्तु कुछ को देशाटन की ही चाट पड़ जाती है 
इसलिए गोरखनाथ का अवधूतों के लिए एक उपदेश है की देश-देशांतर में जाना स्वयं देशांतर के उद्देश्य से आवश्यक नहीं है यदि चित्त स्थिर है और काम क्रोध का निवारण हो गया है तो सब देशांतर हो गए क्योकि निवृति के ही हेतु देशांतर किया जाता है, जो चित्त की स्थिरता से निष्पन्न हो जाता है 

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