नाथ कहै तुम सुनहु रे अवधू दिढ करि राषहु चीया I
काम क्रोध अहंकार निबारौ तौ सबै दिसंतर किया II
काम क्रोध अहंकार निबारौ तौ सबै दिसंतर किया II
योगिो का कोई घर बार नहीं, सारी दुनिया उनका घर है I इसलिए वे सर्वत्र घूमते रहते है I यह उनकी विरक्ति का सूचक है किन्तु कुछ को देशाटन की ही चाट पड़ जाती है I
इसलिए गोरखनाथ का अवधूतों के लिए एक उपदेश है की देश-देशांतर में जाना स्वयं देशांतर के उद्देश्य से आवश्यक नहीं है I यदि चित्त स्थिर है और काम क्रोध का निवारण हो गया है तो सब देशांतर हो गए I क्योकि निवृति के ही हेतु देशांतर किया जाता है, जो चित्त की स्थिरता से निष्पन्न हो जाता है I
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