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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Tuesday, April 12, 2016

Gorakh- Baani (Shabdi - 30)

स्वामी बन षंण्डि जाऊं तो षुध्या व्यापै नगरी जाऊँ त माया 
भरी भरी शाऊ त बिंद बियापै क्यों सिझति जल ब्यंद की काया I

हे स्वामी, जो वनखण्ड जाता हूँ तो क्षुधा व्यापती है, भूख सताती है, नगर में जाता हूँ तो माया आकृष्ट करती है, 
और भर भर कर खाता हूँ तो शुक्र के बढ़ने से काम वासना सताती है  तब जल बून्द अर्थात शुक्र से निर्मित इस शरीर को किस प्रकार सिद्ध बनाए 

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