गगने न गोपंत तेजे न सोषन्त पवने न पेलंत बाई I
यही भारे न भाजंत उदके न डूबंत कहौ तौ को पतियाई II
यही भारे न भाजंत उदके न डूबंत कहौ तौ को पतियाई II
आत्मतत्त्व का अनुभव कर लेने पर जान पड़ता है की उसे न तो आकाश(पंचभूतों में से एक ) गुप्त कर सकता है, न अग्नि सुख सकती है, न हवा इधर-उधर झोंके से उड़ा(प्रेरित कर) सकती है, न पृथ्वी का भार तोड़ (विभक्त कर) सकता है, न पानी डूबा सकता है, परन्तु यदि यह बात मै किसी से कहुँ तो कौन मेरा विश्वास कर सकता है I क्योकि इस तत्वों के साथ जिन गुणों और क्रियाओ का सम्बन्ध जान साधारण सामान्यतया देखा करते है, उसको मेरे कथन में विरोध दिख पड़ेगा II
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