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Gorakh-Baani( Sabdi-26)

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा I  तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरष मरि दीठा II  है जोगी !  मरो, मरण मीठा होता है I  किन्तु वह मौत मरो जिस मौत ...

Monday, March 14, 2016

Gorakh-Baani( Sabdi - 24)

गगने न गोपंत तेजे न सोषन्त पवने न पेलंत बाई I 
यही भारे न भाजंत उदके न डूबंत कहौ तौ को पतियाई II 

आत्मतत्त्व का अनुभव कर लेने पर जान पड़ता है की उसे न तो आकाश(पंचभूतों में से एक ) गुप्त कर सकता है, न अग्नि सुख सकती है, न हवा इधर-उधर झोंके से उड़ा(प्रेरित कर)  सकती है, न पृथ्वी का भार तोड़ (विभक्त कर) सकता  है, न पानी डूबा सकता है, परन्तु यदि यह बात मै किसी से कहुँ तो कौन मेरा विश्वास कर सकता है  I क्योकि इस तत्वों के साथ जिन गुणों और क्रियाओ का सम्बन्ध जान साधारण सामान्यतया देखा करते है, उसको मेरे कथन में विरोध दिख पड़ेगा II 

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