गगन मंडल मै ऊंधा कूबा तहाँ अंम्रत का बासा I
सगुरा होइ सु भरि भरि पीवै निगुरा जाइ प्यासा II
सगुरा होइ सु भरि भरि पीवै निगुरा जाइ प्यासा II
आकाश मंडल यानी शून्य अथवा ब्रह्म्मरन्ध्र में एक औन्धे मुँह का कुआँ है, जिसमे अमृत का वास है I जिसने अच्छे गुरु की शरण ली है वही उसमे से भर-भरकर अमृत पी सकता है I क्योकि उसे पीने का उपाय गुरु ही बता सकता है I जिसने किसी अच्छे गुरु को धारण नहीं किया वह इस अमृत का पान नहीं कर सकता, प्यासा ही रह जाता है I
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